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Thursday, February 18, 2021

अपनी पीढ़ी के लिए

 वे सारे खीरे जिनमें तीतापन है हमारे लिए

वे सब केले जो जुड़वां हैं.

वे आम जो बाहर से पके पर भीतर खट्टे हैं, चूक

और तवे पर सिंकती पिछली रोटी परथन की

सब हमारे लिए.


ईसा की बीसवीं शाताब्दी की अंतिम पीढ़ी के लिए,

वे सारे युद्ध और तबाहियां.

मेला उखड़ने के बाद का कचड़ा-महामारियां,

समुद्र में डूबता सबसे प्राचीन बंदरगाह,

और टूट कर गिरता सर्वोच्च शिखर

सब हमारे लिए.


पोलिथिन थैलियों पर जीवित गौवों का दूध हमारे लिए

शहद का छत्ता खाली

हमारे लिए वो हवा, फेफड़े की अंतिम मस्तकहीन धड़.

पूर्वजों के सारे रोग हमारे रक्त में

वे तारे भी हमारे लिए जिनका प्रकाश अब तक पहुंचा ही नहीं हमारे पास

और वे तेरह सूर्य जो कहीं होंगे आज भी सुबह की प्रतीक्षा में.


सबसे सुंदर स्त्रियां और सबसे सुंदर पुरुष

और वो फूल जिसे मना है बदलना फल में

हमारी ही थाली में शासकों के दांत छूटे हुए

और जरा सी धूप में धधक उठती आदिम हिंसा.


जब भी हमारा जिक्र हो कहा जाए

हम उस समय जिए जब

सबसे आसान था चंद्रमा पर घर,

और सबसे मुहाल थी रोटी.


और कहा जाए

हर पीढ़ी की तरह हमें भी लगा

कि हमारे पहले अच्छा था सब कुछ

और आगे सब अच्छा होगा.

Sunday, February 17, 2013

अपनी पीढ़ी के लिए


वे सारे खीरे जिनमें तीतापन है हमारे लिए 
वे सब केले जो जुडवां हैं 
वे आम जो बाहर से पके पर भीतर खट्टे हैं चूक 
और तवे पर सिंकती पिछली रोटी परथन की 
सब हमारे लिए 
ईसा की बीसवीं शाताब्दी की अंतिम पीढी के लिए 
वे सारे युद्ध और तबाहियां 
मेला उखडने के बाद का कचडा महामारियां 
समुद्र में डूबता सबसे प्राचीन बंदरगाह 
और टूट कर गिरता सर्वोच्च शिखर 
सब हमारे लिए 
पोलिथिन थैलियों पर जीवित गौवों का दूध हमारे लिए 
शहद का छत्ता खाली 
हमारे लिए वो हवा फेफडे की अंतिम मस्तकहीन धड. 
पूर्वजों के सारे रोग हमारे रक्त में 
वे तारे भी हमारे लिए जिनका प्रकाश अब तक पहुंचा ही नहीं हमारे पास 
और वे तेरह सूर्य जो कहीं होंगे आज भी सुबह की प्रतीक्षा में 
सबसे सुंदर स्त्रियां और सबसे सुंदर पुरूष 
और वो फूल जिसे मना है बदलना फल में 
हमारी ही थाली में शासकों के दांत छूटे हुए 
और जरा सी धूप में ध्धक उठती आदिम हिंसा 

जब भी हमारा जिक्र हो कहा जाए 
हम उस समय जिए जब 
सबसे आसान था चंद्रमा पर घर 
और सबसे मोहाल थी रोटी 
और कहा जाए 
हर पीढी की तरह हमें भी लगा 
कि हमारे पहले अच्छा था सब कुछ 
और आगे सब अच्छा होगा।

-अरुण कमल

सूचकांक


पहले एक क़िताब की दुकान पर काम पकड़ा
हफ़्ते-भर रहा फिर बैठ गया
बोला, मन नहीं लगा;

जब रात भर पेट गुड़गुड़ाया तो फिर एक प्रेस में लग गया
और कोई दस दिन बाद मुझे मंदिर की सीढ़ियों पर मिला
मालिक जल्लाद था, बोला;
तब विद्यार्थियों के लिए टिफ़िन ढोने लगा बाँस के डंडे पर
और चौथे ही दिन अण्डा चुराने के इल्जाम में वापस
सड़क पर;

फिर एक कूरियर सर्विस में घुस गया
और भूत की तरह बारह दिन सायकिल रौंदने और
सैंकड़ों घंटियाँ बजाने के बाद
उसे अचानक लगा कि वह सिर्फ़ ख़ुराकी पर खट रहा है
तो एक दिन मय चिट्ठियों के चम्पत हो गया;

फिर तो कई काम किये, छोड़े, किये छोड़े
मारा-मारा फिरा एक दो बार घायल भी हुआ पता नहीं कैसे,
एक दिन अस्पताल में मिल गया पड़ा-पड़ा
खिड़की से पुकारा
पर प्यारे ने हिम्मत नहीं हारी
हाथ-पाँव मारता रहा

आख़िर एक दिन दारु-भट्टी में जुगाड़ लगा
और वहाँ टिक गया
शरीर भी अब गोटा गया
फट से दो-दो कमीज़ें खरीदीं, एक सफ़ेद एक धारी वाली
एक काला चश्मा
और एक कैप जिसे कालेजिया लड़कों की तरह उल्टा पहनता
और एक दिन लड़की भी देख ली रिश्ते में

तभी एक दिन देखा मैंने
पटने के अशोक राजपथ पर
अगल-बगल सिपाही
कमर में रस्सा!

-अरुण कमल