Showing posts with label उमाकांत मालवीय. Show all posts
Showing posts with label उमाकांत मालवीय. Show all posts

Sunday, January 1, 2012

हम चले, हम चले, हम चले


हम चले, हम चले, हम चले
ज्वार में आज तूफ़ान तले.
पाँव तक खुद चले रहे
एक दो क्या सभी मरहले .
      अजगरो सी लहर उठ रही है तो उठे,
      पाँव पर है भरोसा हमें.
      है हरारत लहू और पसीना सभी -
      क्या नहीं है, यहाँ बांह में.
      छूट जाए सहारे भले.
      आसमान छू रहे हौसले. हम चले..
कश्तियाँ डगमगाती रहे तो रहें
पर्वतों से अडिग हम रहें
हो मगर या भंवर या की मघ्धर हो
सौ क़यामत, कहर भी ढहे,
प्राण फौलाद में है ढले.
झूमते चल पड़े काफिले, हम चले .......
       आफतों की घटाएं घिरें तो घिरें
       सर उठाये सिपाही बढ़ें.
       बिजलियों सी बलाएँ गिरें तो गिरें
       दौडकर विघ्न पर जा चढ़े .
       मंजिले है कदमो के तले.
                 खुद बी खुद घट चले फासले , हम चले.........
-उमाकांत मालवीय

Thursday, December 1, 2011

झण्डे रह जायँगे, आदमी नहीं


झण्डे रह जायँगे, आदमी नहीं, 
इसलिए हमें सहेज लो, ममी, सही । 


जीवित का तिरस्कार, पुजें मक़बरे, 
रीति यह तुम्हारी है, कौन क्या करे । 
ताजमहल, पितृपक्ष, श्राद्ध सिलसिले, 
रस्म यह अभी नहीं, कभी थमी नहीं । 


शायद कल मानव की हों न सूरतें 
शायद रह जाएँगी, हमी मूरतें ।
आदम के शकलों की यादगार हम, 
इसलिए, हमें सहेज लो, डमी सही । 


पिरामिड, अजायबघर, शान हैं हमीं,
हमें देखभाल लो, नहीं ज़रा कमी । 
प्रतिनिधि हम गत-आगत दोनों के हैं, 
पथरायी आँखों में है नमी कहीं ?


-उमाकांत मालवीय