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Sunday, February 17, 2013

विकास


ईख की पत्ती, कास, सरपत
जो भी काम भर को मिला
उसी से झोपड़ी बना कर रहे।

फिर भीत खडी की
और भीत के बचाव के लिये
मिट्टी तैयार की
और इसी मिट्टी से
ख़पड़े रच कर धूप में सुखाए
फिर अवाँ लगा कर
अच्छी तरह पका कर
घर को मजबोत छाजन दी।

मिट्टी ले लेने से खत्ता जो बन गया
उस में बरसाती जल भर गया-
जिसे लोग बावड़ी, तलैया और पोखरी
के नाम से जानते थे-
बावड़ी में मछलियाँ, कछवे, ढेर सारे जल जीव
आ बसे।
मछलियाँ बिकने लगीं।

-त्रिलोचन

दुनिया कैसे बचे


उर्वरकों के अंधाधुंध 
उपयोग से कृषि के लिए
हानिकर कीट तो नष्ट
ही हो गये
साथ ही दूसरे जीव भी
समाप्त हो गए
वनस्पतियों के सहारे जीने वाले
जीव जंतु भी जीव रहित हो गए
गीध आदि जो वायुमंडल को
स्वच्छ रखा करते थे
नष्ट होते होते नष्ट हो चले
इस दुर्घट योग से 
दुनियाँ कैसे बचे?

-त्रिलोचन

दीवारें दीवारें दीवारें दीवारें


दीवारें दीवारें दीवारें दीवारें
चारों ओर खड़ी हैं । तुम चुपचार खड़े हो
हाथ धरे छाती पर , मानो वहीं गड़े हो।

मुक्ति चाहते हो तो आओ धक्‍के मारें
और ढ़हा दें । उद्यम करते कभी न हारें
ऐसे वैसे आघातों से । स्‍तब्‍ध पड़े हो
किस दुविधा में।हिचक छोड़ दो। जरा कड़े हो।

आओ , अलगाने वाले अवरोध निवारें।
बहार सारा विश्‍व खुला है , वह अगवानी
करने को तैयार खड़ा है पर यह कारा
तुमको रोक रही है। क्‍या तुम रूक जाओगे।

नहीं करोगे ऊंची क्‍या गरदन अभिमानी।
बांधोगे गंगोत्री में गंगा की धारा।
क्‍या इन दीवारों के आगे झुक जाओगे।

-त्रिलोचन