Monday, November 4, 2024

हम आँधियों के बन में किसी कारवाँ के थे --जौन एलिया

हम आँधियों के बन में किसी कारवाँ के थे

जाने कहाँ से आए हैं जाने कहाँ के थे

 

ऐ जान-ए-दास्ताँ तुझे आया कभी ख़याल

वो लोग क्या हुए जो तिरी दास्ताँ के थे

 

हम तेरे आस्ताँ पे ये कहने को आए हैं

वो ख़ाक हो गए जो तिरे आस्ताँ के थे

 

मिल कर तपाक से न हमें कीजिए उदास

ख़ातिर न कीजिए कभी हम भी यहाँ के थे

 

क्या पूछते हो नाम-ओ-निशान-ए-मुसाफ़िराँ

हिन्दोस्ताँ में आए हैं हिन्दोस्ताँ के थे

 

अब ख़ाक उड़ रही है यहाँ इंतिज़ार की

ऐ दिल ये बाम-ओ-दर किसी जान-ए-जहाँ के थे

 

हम किस को दें भला दर-ओ-दीवार का हिसाब

ये हम जो हैं ज़मीं के न थे आसमाँ के थे

 

हम से छिना है नाफ़-पियाला तिरा मियाँ

गोया अज़ल से हम सफ़-ए-लब-तिश्नगाँ के थे

 

हम को हक़ीक़तों ने किया है ख़राब-ओ-ख़्वार

हम ख़्वाब-ए-ख़्वाब और गुमान-ए-गुमाँ के थे

 

सद-याद-ए-याद 'जौन' वो हंगाम-ए-दिल कि जब

हम एक गाम के न थे पर हफ़्त-ख़्वाँ के थे

 

वो रिश्ता-हा-ए-ज़ात जो बरबाद हो गए

मेरे गुमाँ के थे कि तुम्हारे गुमाँ के थे

 


मैं एक शादीशुदा औरत हूँ! --शाहरुख़ हैदर

मैं एक औरत हूँ 

ईरानी औरत

रात के आठ बजे हैं

यहां ख़याबान सहरूरदी शिमाली पर

बाहर जा रही हूँ रोटियां ख़रीदने

न मैं सजी धजी हूँ 

न मेरे कपड़े ख़ूबसूरत हैं

मगर यहां 

सरेआम

ये सातवीं गाड़ी है...

मेरे पीछे पड़ी है

कहते हैं 

शौहर है या नहीं

मेरे साथ घूमने चलो

जो भी चाहोगी तुम्हें ले दूंगा।

यहां तंदूरची है...

वक़्त साढ़े आठ हुआ है

आटा गूंथ रहा है 

मगर पता नहीं क्यों

मुझे देखकर आंख मार रहा है

नान देते हुए 

अपना हाथ 

मेरे हाथ से मिस कर रहा है!!

ये तेहरान है...

सड़क पार की तो 

गाड़ी सवार मेरी तरफ आया

गाड़ी सवार.. क़ीमत पूछ रहा है

रात के कितने ?

मैं नहीं जानती थी 

रातों की क़ीमत क्या है!!

ये ईरान है...

मेरी हथेलियां नम हैं

लगता है बोल नहीं पाऊंगी

अभी मेरी शर्मिंदगी और रंज का पसीना

ख़ुश्क नहीं हुआ था कि घर पहुंच गई।

इंजीनियर को देखा...

एक शरीफ़ मर्द 

जो दूसरी मंज़िल पर 

बीवी और बेटी के साथ रहता है

सलाम...

बेगम ठीक हैं आप ?

आपकी प्यारी बेटी ठीक है ?

वस्सलाम...

तुम ठीक हो? ख़ुश हो ?

नज़र नहीं आती हो ?

सच तो ये है 

आज रात मेरे घर कोई नहीं

अगर मुमकिन है तो आ जाओ

नीलोफ़र का कम्प्यूटर ठीक कर दो

बहुत गड़बड़ करता है

ये मेरा मोबाइल है

आराम से चाहे जितनी बात करना

मैं दिल मसोसते हुए कहती हूँ

बहुत अच्छा अगर वक़्त मिला तो ज़रूर!!

ये सरज़मीने-इस्लाम है

ये औलिया और सूफ़ियों की सरज़मीन है

यहां इस्लामी क़ानून राइज हैं

मगर यहां जिन्सी मरीज़ों ने

मादा ए मन्विया (वीर्य) बिखेर रखा है।

न दीन न मज़हब न क़ानून

और न तुम्हारा नाम हिफ़ाज़त कर सकता है।

ये है 

इस्लामी लोकतंत्र...

और मैं एक औरत हूँ

मेरा शौहर 

चाहे तो चार शादी करे

और चालीस औरतों से मुताअ

मेरे बाल 

मुझे जहन्नुम में ले जाएंगे

और मर्दों के बदन का इत्र

उन्हें जन्नत में ले जाएगा

मुझे 

कोई अदालत मयस्सर नहीं

अगर मेरा मर्द तलाक़ दे 

तो इज़्ज़तदार कहलाए

अगर मैं तलाक़ मांगू 

तो कहें

हद से गुज़र गई शर्म खो बैठी

मेरी बेटी को शादी के लिए

मेरी इजाज़त दरकार नहीं

मगर बाप की इजाज़त लाज़िमी है।

मैं दो काम करती हूँ

वह काम से आता है आराम करता है

मैं काम से आकर फिर काम करती हूँ

और उसे 

सुकून फ़राहम करना मेरा ही काम है।

मैं एक औरत हूँ...

मर्द को हक़ है कि मुझे देखे

मगर ग़लती से अगर 

मर्द पर मेरी निगाह पड़ जाए

तो मैं आवारा और बदचलन कहलाऊं।

मैं एक औरत हूँ...

अपने तमाम पाबंदी के बाद भी औरत हूँ

क्या मेरी पैदाइश में कोई ग़लती थी ?

या वह जगह ग़लत थी जहां मैं बड़ी हूई ?

मेरा जिस्म 

मेरा वजूद

एक आला लिबास वाले मर्द की सोच और 

अरबी ज़बान के चंद झांसे के नाम बिका हुआ है।

अपनी किताब बदल डालूं 

या

यहां के मर्दों की सोच

या 

कमरे के कोने में क़ैद रहूं ?

मैं नहीं जानती...

मैं नहीं जानती 

कि क्या मैं दुनिया में

बुरे मुक़ाम पर पैदा हुई हूँ

या बुरे मौके पर पैदा हुई हूँ।

 


अपनी असुरक्षा से --अवतार सिंह 'पाश'

यदि देश की सुरक्षा यही होती है

कि बिना ज़मीर होना ज़िन्दगी के लिए शर्त बन जाये

आँख की पुतली में ‘हाँ’ के सिवाय कोई भी शब्द

अश्लील हो

और मन बदकार पलों के सामने दण्डवत झुका रहे

तो हमें देश की सुरक्षा से ख़तरा है

हम तो देश को समझे थे घर-जैसी पवित्र चीज़

जिसमें उमस नहीं होती

आदमी बरसते मेंह की गूँज की तरह गलियों में बहता है

गेहूँ की बालियों की तरह खेतों में झूमता है

और आसमान की विशालता को अर्थ देता है

हम तो देश को समझे थे आलिंगन-जैसे एक एहसास का नाम

हम तो देश को समझते थे काम-जैसा कोई नशा

हम तो देश को समझे थे क़ुर्बानी-सी वफ़ा

लेकिन ’गर देश

आत्मा की बेगार का कोई कारखाना है

’गर देश उल्लू बनने की प्रयोगशाला है

तो हमें उससे ख़तरा है

गर देश का अमन ऐसा होता है

कि कर्ज़ के पहाड़ों से फिसलते पत्थरों की तरह

टूटता रहे अस्तित्व हमारा

और तनख़्वाहों के मुँह पर थूकती रहे

कीमतों की बेशर्म हँसी

कि अपने रक्त में नहाना ही तीर्थ का पुण्य हो

तो हमें अमन से ख़तरा है

गर देश की सुरक्षा ऐसी होती है

कि हर हड़ताल को कुचलकर अमन को रंग चढ़ेगा

कि वीरता बस सरहदों पर मरकर परवान चढ़ेगी

कला का फूल बस राजा की खिड़की में ही खिलेगा

अक़्ल, हुक़्म के कुएँ पर रहट की तरह ही धरती सींचेगी

मेहनत, राजमहलों के दर पर बुहारी ही बनेगी

तो हमें देश की सुरक्षा से ख़तरा है।

दुनिया भर में डर --एदुआर्दो गालेआनो

(एदुआर्दो गालेआनो, उरुग्वे के कवि, लेखक और इतिहासकार थे. उन्हें लातिन अमेरिका के सबसे मशहूर लेखकों में गिना जाता है. उन्होंने कई किताबें लिखी हैं, जिनमें से एक किताब का नाम 'लातिन अमरीका के रिसते जख्म' और दूसरी किताब का नाम 'आग की यादें' है. दोनों किताबें गार्गी प्रकशन से हिंदी में छप चुकी हैं.


जो लोग काम पर लगे हैं वे भयभीत हैं

कि उनकी नौकरी छूट जायेगी

जो काम पर नहीं लगे वे भयभीत हैं

कि उनको कभी काम नहीं मिलेगा

जिन्हें चिंता नहीं है भूख की

वे भयभीत हैं खाने को लेकर

लोकतंत्र भयभीत है याद दिलाये जाने से और

भाषा भयभीत है बोले जाने को लेकर

आम नागरिक डरते हैं सेना से,

सेना डरती है हथियारों की कमी से

हथियार डरते हैं कि युद्धों की कमी है

यह भय का समय है

स्त्रियाँ डरती हैं हिंसक पुरुषों से और पुरुष

डरते हैं निर्भय स्त्रियों से

चोरों का डर, पुलिस का डर

डर बिना ताले के दरवाज़ों का,

घड़ियों के बिना समय का

बिना टेलीविज़न बच्चों का, डर

नींद की गोली के बिना रात का और दिन

जगने वाली गोली के बिना

भीड़ का भय, एकांत का भय

भय कि क्या था पहले और क्या हो सकता है

मरने का भय, जीने का भय.