Wednesday, October 25, 2017

शिल्पकार की एक रचना

बोनसाई वृक्ष
आकर्षक गमले में उग रहा है
कहीं और वह 
अस्सी फीट ऊँचा हो सकता था
लेकिन किसी पर्वत के किनारे
बिजली की कडक
उसे तोड़ देती.
लेकिन अब एक माली ने
सावधानी से इसे छांट दिया
यह नौ इंच ऊँचा है.
हर दिन उसकी शाखाओं को काटा गया
माली गुनगुनाता है
मेरे मुन्ने, यह तेरा स्वभाव है
नन्हें ही बने रहो
और आराम करो,
घर में ही रहो और गुलबदन बन जाओ;
मेरे नन्हें वृक्ष तू कितना भाग्यशाली है रे
तेरे पास एक गमला है
जहां तू ख़ूब बढे, मोटाये, फले-फूले
तू खूब जिए और खुश रहे.
जीवित प्राणियों के साथ
किसी को बहुत जल्दी ही
खुद को बोनसाई बनाने की कला सीख लेनी' चाहिए
उसे चाहिए कि वह अपने
पैर को बाँध ले,
दिमाग को आराम दे,
बाल घुंघराले बना ले,
और हाथ से केवल
मुलायम प्यार को छुए.
– मार्ज पियार्सी की कविता का भावानुवाद
(विक्रम प्रताप)